जब ग़ज़ल ईमान भी खोने लगे
ये कविता आन भी खोने लगे
तब चले आना लिए कुछ चुटकुलें
मंच अपनी शान भी खोने लगे
खामुशी है तालियों की बात पर
आज श्रोता आ गये हैं जात पर
छोड़ कर जज़्बात दो आवारगी
आप भी आ जाईये औक़ात पर
किस कवि ने तालियाँ हासिल किया
किसने रौशन आज ये महफिल किया
ये छिछोरापन कहीं लफ्फाजियाँ
किसने अपने खून में शामिल किया
क्यों अदब वाले कबाड़ी हो गए
इल्मवाले ही अनाड़ी हो गए
लिख रहे हैं छोरियों के वास्ते
पीठ पीछे सब दिहाड़ी हो गए
खेलते हैं फेसबुक पर यारियाँ
व्हाट्सएप पर ढ़ेर सारी पारियाँ
छद्म नामों से बनाकर आई डी
कुछ पुरुष बनने लगे हैं नारियाँ
शख्सियत उम्दा हकीकत कुछ नहीं
मंच पर जिनकी जरूरत कुछ नहीं
वो बुलाए ही गए हैं इसलिए
जो सियासत की बदौलत कुछ नहीं
-दिनकर राव दिनकर
