उलझन

हाजिरी रजिस्टर में आज आख़िरी बार हस्ताक्षर करते हुए शर्मा जी के हाथ काँप रहे थे। इस कम्पनी में काम करते हुए उन्हें पच्चीस वर्ष हो चुके थे। आज तक उन्होंने किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं की थी। छोटे से छोटे कर्मचारी और बड़े से बड़े अधिकारी तक, सभी को उन्होंने समान रूप से सम्मान दिया था। यही कारण था कि सभी उनका भी सम्मान करते थे। यहाँ तक कि कम्पनी के मालिक भी उन्हें “जी” और “आप” कहकर संबोधित करते थे।
और करते भी क्यों नहीं? जब उन्होंने कम्पनी जॉइन की थी, तब वर्तमान मालिक अपने पिताजी के साथ कभी-कभार ऑफिस आया करते थे। पूरा कार्यालय उनके खेलने की जगह बन जाता था।
परन्तु आज सुबह से किसी ने उनसे ज़्यादा बात नहीं की। आज उनका आख़िरी दिन था। मालिक भी ऑफिस नहीं आए थे। मन में एक अजीब-सी उलझन थी।
“क्या कोई मुझे विदा भी नहीं करेगा?”
खैर, सब वक़्त-वक़्त की बात है।
भारी मन से उन्होंने अपना स्कूटर उठाया और घर की ओर चल पड़े। रास्ते भर न जाने कितने विचार मन में आते रहे। घर वाले क्या सोचेंगे? किसी ने एक माला तक पहनाकर विदा नहीं किया।
पता ही नहीं चला कि कब घर आ गया। स्कूटर खड़ा करके उन्होंने दरवाज़े की घंटी बजाई। दरवाज़ा खुला तो वे हैरान रह गए।
अरे! यह क्या?
दरवाज़ा तो रोज़ उनकी पत्नी खोलती थीं, लेकिन आज सामने मालिक खड़े थे।
वे कुछ बोल पाते, उससे पहले ही मालिक आगे बढ़े, उनके पैर छुए और कसकर गले लगा लिया।
अंदर पहुँचे तो उनकी आँखों को यक़ीन ही नहीं हुआ। उनका पूरा स्टाफ, जिसे वे अभी आधा घंटा पहले ऑफिस में छोड़कर आए थे, वहाँ मौजूद था। सभी ने उन्हें मालाओं से लाद दिया।
उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे अपनी भावनाएँ व्यक्त करें। मन, गला, दिल और आँखें सब भावनाओं से लबालब थे।
तभी मालिक आगे आए और एक लिफाफ़ा उनकी ओर बढ़ा दिया।
उन्होंने लिफाफ़ा खोला तो होश उड़ गए।
अंदर दस लाख रुपये का चेक था।
उन्होंने मालिक की ओर देखा।
मालिक ने हाथ जोड़कर कहाः- “बाबूजी के ज़माने से आप हमारी कम्पनी के साथ हैं। मुझे माफ़ कर दीजिएगा, मैं इतना ही कर पाया हूँ।”
यह कहते हुए उन्होंने फिर से उन्हें गले लगा लिया।
कुछ देर बाद सभी लोग विदा हो गए।
सुबह से मन में पल रही उलझन, सम्मान और अपनत्व के उस सैलाब में कब बह गई, उन्हें स्वयं भी पता नहीं चला।

-गोपेश दशोरा,
उदयपुर (राजस्थान)

1 कमेंट

  • Pradeep Kumar Arora 9425192297

    बेहतरीन कथा 👍

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