उलझन

कहाँ खोई हुई हो बड़ी गम्भीर भी लग रही हो क्या बात है? श्यामा की आवाज ने सुरभी को झकझोर दिया।
अहं कुछ नहीं बहन।
कुछ तो है ऐसा लग रहा है जैसे बहुत उलझी उलझी हो।
श्यामा के जोर देने पर सुरभी ज्यादा देर अपनी उलझन छुपा न पाई तुम सही कह रही हो काफी कशमकश चल रही है क्या करूँ क्या ना करूँ। एक तरफ बेटे का मोह उसकी भावनाऐं हैं और दूसरी तरफ मेरा आत्मसम्मान गहरी सास लेते ये कहते हुए सुरभी की आँखे छलक आई।
तुम्हें पता है श्यामा इनके जाने के बाद सौरभ बड़े मान के साथ मुझे यहाँ ले कर आया था माँ अब आप यहाँ अकेले रह कर क्या करेंगी हमारे साथ चलिये मैंने तब सोचने का समय मांगा और फिर बहुत सोच विचार कर बेटे की मान घर व्यवस्थित कर एक पोरशन किराऐ पर दे यहाँ चली आई, बीच-बीच में हम जा कर घर की देखभाल भी करते रहते। दस साल कैसे बीते पता ही न चला पर अब एक-एक दिन काटना मुश्किल होते जा रहा है, बहू का बदला रवैया बर्दाश्त से बाहर हो गया है। बच्चे बड़े हो गए, और वर्क फ्राम होम हो गया, समधी के गुजर जाने से अब उसकी माँ भी अकेली हो गई है, भाई भाभी के साथ माँ की पटरी नहीं बैठ रही वो अपनी माँ को यहाँ लाना चाह रही है। मगर उसे लगता है कि मेरे रहने से शायद ऐसा नही कर पा रही उसी की भड़ास मुझ पर निकालती रहती है। मैं क्या करूँ क्या नहीं उलझ कर रह गई हूँ, बेटे का सोच कर यहाँ रहने को मजबूर हो जाती हूँ लेकिन यूँ बहू की बातें भी बर्दाश्त नहीं होती, सौरभ बहुत ही ख्याल रखता है मेरा उससे और बच्चों से कोई शिकायत नहीं मुझे साथ ही मेरी वापसी का कदम बेटे बहू के बीच दरार न डाल दे।
सुरभी की बातें सुनकर श्यामा के माथे पर लकीरें खिंच आईं बहुत सोच-विचार कर बड़ी गम्भीरता से उसने कहा अगर समस्या समधिन जी के आने की है तो मेरे विचार से आपको खुद होकर शैली से अपनी माँ को यहाँ लाने के लिए कहिए इससे शैली को अच्छा महसूस होगा कि उसकी माँ भी उसके साथ रह सकती है आपके रहते हुए भी। आप को भी अपना हम उम्र सखी मिल जायेगी थोड़ा समय साथ रहकर देखिए यदि सबकुछ बढ़िया चलता है तो ठीक है नहीं तो अपने घर वापस चले जाइयेगा। वैसे भी उम्र के इस पडाव पर हमें आपसी प्रेम और सम्मान के अलावा चाहिए ही क्या होता है, उसकी माँ समझदार होगी तो आपका स्थान मान सम्मान कुछ नहीं बदलेगा है ना। चलो अब घर चलते हैं दिया बत्ती का टाइम हो गया है।
बगीचे की उस बेंच से उठते हुए सुरभी बहुत ही सहज महसूस कर रही थी आते हुए जो कदम बोझिल से थे अब वे हल्के लग रहे थे उलझी हुई गुत्थी सुलझ गई थी।

-स्मृति गुप्ता
जबलपुर

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