अपने लिए जिये तो क्या जिए

“अरे सचेतना, रुक जा यार! थोड़ा धीरे चल।”

मैं उसे पुकारते हुए उसके पीछे-पीछे तेज़ी से बढ़ रही थी। उस समय कहाँ पता था कि कुछ ही क्षणों बाद यह हँसी-ठिठोली चिंता और पीड़ा में बदल जाएगी।

यह उन दिनों की बात है जब मैं दसवीं कक्षा की छात्रा थी। संगीत मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा था। ईश्वर की कृपा से मुझे गाने का वरदान मिला था और शायद उसी का प्रतिफल था कि मेरा चयन एन.सी.सी. के गणतंत्र दिवस समारोह के लिए बिहार ग्रुप की ओर से हुआ। हम सभी कैडेट्स पहले जमशेदपुर से रांची पहुँचे और वहाँ से विभिन्न स्थानों से आए कैडेट्स के साथ मिलकर दिल्ली के लिए रवाना हुए।

दिल्ली पहुँचते ही हमारे मन में उत्साह की लहर दौड़ गई। विशाल कैंप, अनुशासित वातावरण और देश के कोने-कोने से आए कैडेट्स सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था। हमें रहने के लिए आवश्यक सामान, यूनिफॉर्म और बॉक्स दिए गए। दिनचर्या व्यस्त थी, पर मेरे और सचेतना के लिए उसमें रियाज़ का समय सबसे प्रिय होता था। हम दोनों सोलो सिंगर के रूप में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।

दिन बीतते गए। प्रतियोगिताएँ हुईं और सौभाग्य से मुझे बिहार ग्रुप की ओर से सोलो सिंगिंग में प्रथम स्थान भी प्राप्त हुआ। उपलब्धि की खुशी अभी मन में ताज़ा ही थी कि कैंप समाप्ति की घड़ी आ पहुँची।

वापसी से पहले सभी कैडेट्स को अपना सामान स्टोर में जमा करना था। इसके लिए हमें एक ठेला-गाड़ी दी गई थी। हम सबने अपना-अपना सामान उसमें रखा और स्टोर तक पहुँचा दिया। सामान जमा करने के बाद वही ठेला-गाड़ी हमारे लिए खेल का साधन बन गई।

सचेतना आगे-आगे चल रही थी और मैं पीछे से उसे आवाज़ें लगाते हुए हँस रही थी। तभी उसके मन में शरारत सूझी। उसने हँसते हुए कहा, “चलो, इसमें बैठकर देखते हैं।”

वह ठेले पर बैठ गई और किसी अन्य कैडेट ने मज़ाक में उसे ज़ोर से धक्का दे दिया। ठेला तेज़ी से आगे बढ़ा। सचेतना की खिलखिलाहट अँधेरे सन्नाटे को चीरती हुई चारों दिशाओं में गूँज रही थी। उसकी हँसी सुनकर लगता था मानो दुनिया की सारी खुशियाँ उसी पल में समा गई हों।

लेकिन अगले ही क्षण सब कुछ बदल गया।

ठेला असंतुलित हुआ और सचेतना ज़मीन पर जा गिरी। मैं घबराकर उसकी ओर दौड़ी। वह अभी भी हँस रही थी, मानो उसे चोट का एहसास ही न हुआ हो। तभी पास के तंबू से कैंप कमांडर की आवाज़ आई—
“बेटा, ज़रा अपना हाथ घुमाकर दिखाओ।”
जैसे ही उसने हाथ घुमाने की कोशिश की, उसकी हँसी एक दर्दभरी चीख में बदल गई। कुछ पल पहले जो स्वर आनंद से गूँज रहा था, अब वही स्वर पीड़ा से काँप उठा। मेरा हृदय जैसे धड़कना भूल गया।
तुरंत एंबुलेंस बुलाई गई और उसे आर्मी अस्पताल ले जाया गया। चोट गंभीर थी। वह बेहोशी की अवस्था में थी, पर बार-बार मेरा ही नाम पुकार रही थी। उसके उस विश्वास ने मुझे भीतर तक छू लिया।

इसी बीच पूरे समूह के लिए दिल्ली-दर्शन का कार्यक्रम बनाया गया। सभी उत्साहित थे। एक अधिकारी ने मुझसे पूछा, “तुम भी चलोगी न?”
उस क्षण मैं सचमुच दोराहे पर खड़ी थी। एक ओर बालमन था, जो दिल्ली घूमने के सपने संजोए बैठा था; दूसरी ओर मेरी घायल सहेली थी, जो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी।
मैंने बिना अधिक सोचे अपना निर्णय ले लिया।
दिल्ली-दर्शन फिर कभी हो सकता था, पर मित्रता की यह परीक्षा दोबारा नहीं आने वाली थी। मैंने घूमने जाने से इंकार कर दिया और अस्पताल में अपनी सहेली के पास बैठकर उसका साथ निभाने का निश्चय किया।
लगभग एक सप्ताह बाद उसके माता-पिता आए और उसे अस्पताल से छुट्टी दिलवाकर पटना ले गए। इसके बाद मैं भी अन्य कैडेट्स के साथ अपने घर लौट आई।

आज वर्षों बाद भी जब उस घटना को याद करती हूँ, तो मन में एक गहरा संतोष भर जाता है। जीवन में पुरस्कार, यात्राएँ और उपलब्धियाँ समय के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, पर रिश्तों के लिए निभाया गया एक छोटा-सा त्याग हमेशा स्मृतियों में उजाला बिखेरता रहता है।

उस दिन मैंने जाना था कि मित्रता केवल साथ हँसने का नाम नहीं है; मित्रता तो उस हाथ को थामे रखने का नाम है, जो पीड़ा में आपको पुकार रहा हो।

-रीति झा

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