अपने लिए जिए तो क्या जिए

हम जीवन को किस प्रकार देखते हैं,जन्म हुआ, बचपन आया,जवानी आई ,पढ़ाई लिखाई फिर बारी कमाई की आई,पैरों पर खड़े हो गए, कर ली सगाई, शादी के बज गए ढोल नगाड़े,धूमधाम से शादी रचाई, कूछ दिन मौज-मस्ती में बिताकर बच्चों की फिक्र समा ई,अरे फिर वही रोना बस अंतर इतना की तुम्हारी जगह बेटे ने पा ई!
अब क्या यही रीति को चलाना भा ई,ये तो होना ही है,पीढ़ी तो हमने आगे बढ़ाई
पर अब सवाल ये है,कि तुमने जगत में आकर किया क्या?
बताओ, बताओ? अरे भाई ये कोई जीना हुआ, कुछ ऐसा किया जो तुम्हारे जाने के बाद भी लोग तुम्हें याद रखें,ये जो किया अपने लिए किया,जितना जिया अपने लिए जिया !अरे ये भी कोई जीना है भाई?
दुनिया में आऐ हो तो कुछ करके जा ओ,तुम्हारे जाने पर लगे तो कि कोई दुनि से गया है,अपने लिए तो अपने रो धो कर चार दिन बाद अपने काम में लग जाएंगे,सप्ताह, महीने ,साल फिर सालों में बदल जाएंगे और सब,सब भूल जाएंगे,अब सोचो,कुछ ऐसा करके जाओ जो तुम संघर्ष करके पाओ,
उसके लिए मेहनत,हिम्मत, लगन और जज्बा,जुनून ये सब होना चाहिए, क्योंकि जो करोगे वो उनके लिए होगा ,जिनको उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है,और वो तुम्हारे जाने के बाद याद दिलाए,
अरे अपने लिए जिए तो क्या जिए
अपनों के साथ-साथ गैरों को जब अपनाओगे ना,उनकी बेहतरी,उनकी हिफाजत, उनकी भलाई, जो तुम्हारे संघर्षों की याद दिलाए,परोपकार की वो परिभाषा गढ़कर जाना जो संसार रते तक याद किया जाए। क्योंकि एक ही जीवन है,एक बार मिला है,यूँही बरबाद ना कर, जी सभी लेते हैं जीवन, तू कुछ अलग यहाँ आबाद तो करप्रकृति की संपदा पर जो घातक वार हो रहे,महिला ओं,बच्चों पर सरेआम अत्याचार हो रहे,कहाँ गर्त में देश जा रहा,मानव ना शर्मसार हो रहे करि ए आकलन
आज के समय में क्या जरूरी है,जनहित के लिए, देश के लिए, मानवता के लिए, समाज के लिए, क्या जरूरी है,संस्कार या अधिकार, कहाँ गए परिवार?? आकलन करना होगा,एक मशाल जलानी होगी जिसकी रोशनी हर घर पहुंचाई जाए, फिर से अलख जगाई जाए।

-किरण मोर
कटनी (म.प्र)

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