भाव पल्लवन
यह पंक्ति हमें जीवन के असली अर्थ से परिचित कराती है। इसका भाव है कि मनुष्य का जीवन केवल अपने स्वार्थ, अपनी सुख-सुविधा और अपनी इच्छाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए।
मनुष्य की जिंदगी अपनी होती है । परंतु इस जीवन पर स्वयं का अधिकार नहीं रहता मानव माता पिता, बच्चे,घर परिवार समाज और देश के लिए जीवन जीता है।इस सबके हित के लिए जीना ही परोपकार कहलाता है।
शास्त्रों में भी लिखा है,,,,
नदियाँ न पीये कभी अपना जल,वृक्ष न खायें कभी अपना फल
सूरज भी अपनी रोशनी और ताप धरती पर लुटाया है।संवारे भी सभी को जीवन देती है
यदि हम केवल अपने लिए जीते हैं, अपना पेट भरते हैं, अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी करते हैं, तो वह जीना पशु-जीवन के समान है। पशु भी खाता-पीता है और अपनी रक्षा करता है। मनुष्य और पशु में अंतर यही है कि मनुष्य में संवेदना है, परोपकार की भावना है।
सच्चा जीवन वह है जो दूसरों के काम आए। किसी भूखे को रोटी देना, किसी रोते हुए को हँसाना, किसी गिरे हुए को उठाना, समाज के लिए कुछ कर जाना – यही जीवन को सार्थक बनाता है। दीपक खुद जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, वृक्ष खुद धूप सहकर दूसरों को छाया देता है, नदी अपना जल दूसरों की प्यास बुझाने में बहा देती है। प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार का संदेश देता है। पेड़ को पत्थर मारो तो वह भी फल देता है। प्रकृति ने इतने उपकार किये है परंतु सब प्राणियों के लिए है वह स्वयं किसी भी वस्तु का उपयोग स्वयं नहीं करती है।
जो व्यक्ति केवल “मैं” और “मेरा” में उलझा रहता है, वह जीवन के अंत में खाली हाथ रहता है। न उसके पास यादें होती हैं, न किसी की दुआएँ। पर जो दूसरों के लिए जीता है, वह मरकर भी लोगों के दिलों में जिंदा रहता है। भगत सिंह, मदर टेरेसा, अब्दुल कलाम को दुनिया इसलिए याद करती है क्योंकि उन्होंने अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया।
इसलिए कहा गया है – “अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।” जीवन की सार्थकता लेने में नहीं, देने में है। स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के लिए जीना ही मनुष्यता है। तभी हमारा जीना सफल कहलाएगा।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
