बारिश की एक बूंद छत की मुंडेर पर अटकी थी। घंटों वहीं ठहरी रही। खुद को बचाती रही – “मैं गिरूंगी तो मिट जाऊँगी।”
फिर एक चिड़िया आई। प्यास से बेहाल। बूंद ने खुद को झुका दिया। बूंद गिर गई, चिड़िया की चोंच में समा गई। चिड़िया उड़ गई। बूंद मिट गई।
शाम को मैंने देखा, उसी जगह एक नन्हा अंकुर फूट आया था। उसी बूंद से।
जो बूंद अपने लिए अटकी रही, वो धूप में सूखकर कुछ न बन सकी। जो बूंद बहकर पराए काम आ गई, वो अंकुर बनकर अमर हो गई।
यही जीवन का गणित है अपने लिए जिया तो क्या जिया।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
