अपने लिए जिए तो क्या‌ जिए ‌

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा‌ जाए‌ तो‌‌‌ आम आदमी भी धनवान बनने‌ के लिए किसी भी तरह से धन कमाने में लगा है, वह चाहे कोयला चोरी करे, बालू चोरी करे या अन्य प्रकृतिक संसाधनों को बर्बाद करके पैसा कमाए।
अखबारों के अनुसार तो भ्रष्टाचार में लिप्त कई नेता, अफसर और कर्मचारी भी पकड़े जा रहे।
सुटकेश में सड़े नोट मिल रहे तो कहीं खेत में गड़े मिल रहे।
इस प्रकार के धन आम हित में न होकर व्यक्तिगत रहे हैं जो किसी काम के नहीं।
पर इसके विपरीत कुछ धनी मारवाड़ी व्यापारी परिवार अपने धनराशि का सदुपयोग भी करते रहे हैं।
राजा महाराजाओं के बनाए मंदिर मठ और जन हित में बनाए तालाब, नहर को छोड़कर मारवाड़ी परिवार भी जन हित के काम करते रहे हैं।
मारवाड़ी परिवारों ने भी मंदिर, धर्मशाला, तालाब आदि बनाकर समाज को उपकृत किया है इस कारण से कि विवेक जागृत है कि अपने लिए जिए तो क्या जिए।।

-अजय पाण्डेय बेबस

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