शाम अकेले पार नदी के
अखियाँ ताक रही मौसम को,
मन में अनेक विचार पल रहे
कैसे शांत करें हम मन को,
एक लहर आती एक जाती
हर बात मन को मेरे भरमाती,
सोच का भी न कोई अंत मिलेगा
माझी की नाव तब किनारा पाती।
ठहर जरा कुछ पल रुक जा तू
शांत समुंदर देख और थम जा,
चाहे जितनी भाग दौड़ हो
मन को रोक यहां तू नम जा।
राहें जितनी कठिन जीवन की
कहीं तो तुझको रुकना होगा,
चाहे जितना अकड़े हो जीवन भर
कभी तो तुझको झुकना होगा।
यही सार है हर जीवन का
प्रश्न जहां है वहीं पे हल है,
आज यदि भले नहीं मिल रहा
प्रश्न आज तो उत्तर कल है।
-ऋतु कोचर
कटंगी

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शानदार सृजन आदरणीया 👌