वह स्वच्छता अभियान का
मुख्य पात्र है
पीछे चौक में पड़ा
सबकी उपेक्षित सामग्री
वह स्वीकार करता है,
सबेरे-सबेरे बुहारा हुआ कचरा
दाल-सब्जी के छिलके
दवाई के रेपर, पॉलिथीन और भी बहुत कुछ।
उसे पता होता है,
आज घर में भोजन बना भी या नहीं,
कौन सी चॉकलेट ने
बच्चों का मन मोहा,
ऑन लाइन मार्केटिंग से
कौन सी सामग्री आज आई,
परिवार के अस्वस्थ बुजुर्ग को
समय पर टेबलेट्स मिली या नहीं,
वह डस्टबिन निष्ठुर नहीं
परिवार का सच्चा हितैषी है।
कोने में पड़ा-पड़ा
वह बस एक ही बात बार-बार सोचता है-
‘किसी सच्चे हितैषी पर
राज़दार होने का आक्षेप लगाकर
उसे कब तक उपेक्षित किया जाता रहेगा।‘
-प्रदीप कुमार अरोरा
(कृति: हाशिए पर सिमटी दुनिया)

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