पर्यावरण स्वच्छ रखने का,
इच्छुक जो भी तन-मन है।
शान्ति विश्व की हिंद देश की,
चाह रहा जो वो सज्जन है।।
वातावरण रहे परिचायक,
जन-घर की खुशहाली का।
सुख-दुख पतझड़ आते-जाते,
रहे जीवन हरियाली का।।
चमन न उजड़ें कटें विटप ना,
वृक्षारोपण हो ना कम ।
प्रकृति-प्रेम चित के भीतर हो,
उठें नेक पथ पे ही कदम।।
निर्मल रखनी होंगी नदियाँ,
हों तरु सड़क किनारे पर।
वन्यजीव सब रहें सुरक्षित,
जुगनू भी गिनें सितारे सर।।
नहीं प्रदूषित हो जन वाणी,
कवि कुल गौरव स्वर महके।
भले-बुरे को पहचाने पर,
संग भलाई के प्रवर चहके।।
भारत के हर गाँव शहर में,
सुविधाएँ जन-जन तक पहुँचें ।
लोग प्रदूषण से भी सजग हों,
असर से इसके जनि झुलसें।।
-विश्वम्भर दयाल तिवारी
