उषाकाल और गोधूलि वेला
प्रकृति के दो सुन्दर रूप,
असीम शांति और नीरव स्पन्दन,
दोनों इनमें करें निवास।
सहर के झोकों में
खिल जातीं कमल पंखुड़ियाँ।
मन वीणा के तारों में भी
बजी घण्टियाँ।
भूल गई अस्तित्व मैं अपना
नये जगत में किया प्रवेश,
जहाँ न कोई रोग शोक है
कोई कलह न भाव विद्रोह।
ऐसे समय प्रकृति सुन्दरता
लगती हमको स्वर्ग समान।
इसे प्रदूषित मत कर मानव,
कर ले प्रकृति का सम्मान।
-राधा गोयल
दिल्ली
