रूपांतरण

आज अचानक उस घर के पास से गुजरा तो नज़र बाड़े में खड़े नीम के पेड़ पर अटक गई। हर साल की तरह इस बार भी नीम के पेड़ से इस पतझड़ में भी पत्ते झर रहे थे। उम्र के पचास बसंत देख चुकी सविता को आँगन में बिखरे सूखे पत्तों को समेटता देख उस घर और नीम की छांव में बिखरी बचपन की यादें ताज़ा हो गई ।
सविता का बेटा राहुल और मैं इस नीम की छांव में दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा खेला करते थे। शोर मचाने पर राहुल के पिता का डांटना, फिर सविता का हम सबको बुला कर लस्सी पिलाना सब कुछ। पर आज सविता की आँखों में उदासी सी तैर रही थी। उसे लग रहा था जैसे जीवन भी इन सूखे पत्तों की तरह धीरे-धीरे उससे छूटता जा रहा है।
राहुल बरसों पहले दूर शहर नौकरी करने चला गया था। शहर जाने के बाद पहले हर हफ्ते राहुल का फोन आता, फिर महीने में एक बार, और अब कभी-कभी ही। घर में उसकी हँसी की जगह अब सन्नाटा पसरा रहता था। राहुल के पिता के गुजर जाने के बाद सविता का वह एक मात्र सहारा था, लेकिन समय के साथ वह भी दूर होता चला गया। घर-गांव के मोह ने सविता को शहर जाने से रोक रखा था। पड़ौसनों के साथ गप-शप, मंदिर , छोटे बच्चों को घर बुलाकर आंगन में खेल सिखाना इत्यादि कामों से उसका दिन कट जाया करता था।
सविता आज आँगन में पड़े नीम के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर जला रही थी। तभी पड़ोस की छोटी बच्ची निम्मी आई और बोली, “काकी, ये पत्ते क्यों जला रही हो? ये तो पेड़ से गिरकर भी यहीं रहते हैं ना?”
सविता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बेटा, ये सूख गए हैं, अब इनका क्या काम?”
निम्मी ने मासूमियत से जवाब दिया, “स्कूल वाली मैडम ने तो बताया था कि ये सूखे पत्ते ही मिट्टी बनकर फिर से पेड़ को ताकत देते हैं। मतलब ये खत्म नहीं होते, फिर से काम आते हैं।”
उसकी बात सुनकर सविता कुछ देर चुप रह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर जमी धूल हटा दी हो। क्या सच में हर बिछड़न अंत नहीं होती? क्या जीवन के सूखे पत्ते भी किसी नए आरंभ का संकेत होते हैं? हरे से पीले हो जाने से क्या उनका अस्तित्व नहीं रहता ?
उसी शाम उसने अपने बेटे को फोन लगाया। इस बार शिकायत नहीं, बस हालचाल पूछा। शायद राहुल भी जैसे इस बदलाव को महसूस कर रहा था। उसने कहा, “माँ, मैं अगले महीने छुट्टी लेकर आऊँगा।”
कुछ दिनों बाद सविता ने घर के आँगन में बच्चों को पढ़ाना भी शुरू कर दिया। गाँव के कई बच्चे रोज़ आने लगे। उनकी हँसी और चहल-पहल से आज घर का सन्नाटा कोलाहल में बदल गया था।
नीम का पेड़ अब लगभग खाली हो चुका था, लेकिन उसकी टहनियों पर नई कोंपलें झाँकने लगी थीं। सविता ने मुस्कुराते हुए उन कोंपलों को देखा और सोचा—“पतझड़ के सूखे पत्ते सिर्फ गिरते नहीं, वे आने वाली हरियाली की तैयारी भी करते हैं।”
अब उसे अपने जीवन के उतार-चढ़ाव से डर नहीं लगता था। उसने समझ लिया था कि समय का प्रवाह कभी रुकता नहीं,और पतझड़ के सूखे पत्तों ने ही नयी कोंपलों में नव संचार किया हैं।

-दिलीप आचार्य “सोमेश्वर”

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