बहू और बेटी

“हास्य-व्यंग्य”

आज भी जब कभी,
कहीं रिश्ता पक्का होता है,

लड़के की माँ का स्वभाव,
देखने में कितना सच्चा होता है।

पास बिठाकर, मुस्काकर,
बात बड़ी मीठी करती है,

“बहू नहीं, बेटी होगी” कहकर
उम्मीदों की खेती करती है।

सुनकर लड़की वाले भी,
मन ही मन इतराते हैं,

सोचते हैं अब तो बेटी के
भाग्य के सितारे चमकने वाले हैं।

कितना भी आधुनिक हो गया हो ज़माना,
यह अंतर गया नहीं,

बहू को बेटी का दर्जा
सबने अब तक दिया नहीं।

बेटी देर से उठ जाए तो,
“थक गई होगी” कह देते हैं,

बहू पाँच मिनट रुक जाए तो,
घर को तानों से भर देते हैं।

बेटी की गलती नादानी है,
बहू की गलती अपराध,

बेटी अभी तो बच्ची है,
मानो बहू के सफेद हो गए हों बाल।

रिश्तों की इस राजनीति पर,
बस इतना कहना है भाई,

बेटी जैसा मान अगर मिल जाए,
तो बहू भी घर की शान बन जाए।

-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)

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