आजकल मोबाइल पर बहुत से ग्रुप चलते हैं। बस ऐसे ही किसी एक साहित्यिक ग्रुप से वंदिता जुड़ी थी। उसे अनुशासन प्रबंधन का दायित्व दिया गया था।
वंदिता अपने उत्तरदायित्व बखूबी निभा रही थी, पर कहते हैं न, सच किसी को रास नहीं आता। उसका सच बोल देना लोगों को बुरा लगता और वो अपने उत्तरदायित्व से कभी पीछे नहीं हटती थी।
एक बार उसने कुछ ऐसे रचनाकार, जो दूसरों की रचनाओं को अपने नाम से ग्रुप में पोस्ट कर देते थे, बार-बार चेतावनी के बाद भी उनमें सुधार नहीं आ रहा था। तब उसने सीधे नाम लिखकर ही उन्हें आगाह करना उचित समझा और वही किया।
बात पटल पर बुरी लगी और उन्होंने सीधे अध्यक्ष महोदया को कह दिया, “जो कहना है, उन्हें पर्सनल पर कहना चाहिए, न कि सबके सामने।”
वंदिता ग़लत नहीं थी, तो उसे कोई चिंता और डर नहीं था, मगर अध्यक्ष महोदया को अपने ग्रुप में मेंबर कम होने की चिंता थी। वहाँ वैसे भी साहित्य कम और दूसरे विषय अधिक होते थे, जो सीधे गूगल से निकालकर लोग पोस्ट कर देते थे, या फिर किसी की भी रचना को अपने नाम से पोस्ट कर वाहवाही लूटते थे।
कई बार वंदिता की लोग बुराई करते, पर वंदिता न कभी अपने कार्य से पीछे हटी और न डरी। उसने अपना उत्तरदायित्व आलोचनाओं के बाद भी बखूबी निभाया।
और उसका साथ कुछ लोगों ने तो नहीं दिया, मगर कहते हैं न, हमेशा सच की जीत होती है। तो ऐसे ही उसके साथी रचनाकारों ने उसका पूरा-पूरा सहयोग दिया और उसके हर फैसले में साथ खड़े रहे।
-अदिति रूसिया
वारासिवनी
