उत्तरदायित्व

प्यार की अनोखी कहानी

“क्या जीजी! किस कबूतर खाने में रह रही हो?”
” चिंता मत कर। मैं तो कबूतर खाने में रह रही हूँ, तुझे मुर्गियों का दड़बा मिलेगा।”
हँसी- हँसी में बड़ी बहन ने छोटी बहन से कहा। पर उसको क्या मालूम था कि हँसी में कही हुई बात सच हो जाएगी। छोटी बहन को वाकई जो ससुराल मिली, वो किसी मुर्गियों के दड़बे से कम नहीं थी। केवल एक रसोई और एक कमरा और रहने वाले सात बहन भाई, सास, एक अविवाहित चाचाजी, एक मौसी का लड़का, एक बुआ का लड़का और एक नवविवाहिता पत्नी।
जिस कमरे में रसोई थी, वह शयनकक्ष भी था, स्नानघर भी और बैठक भी । 6×12 का कमरा जिसमें बाईं तरफ एक अलमारी, उसके सीधे हाथ की तरफ बर्तन रखने का पत्थर और बिल्कुल सामने चौड़ा पत्थर जिसके ऊपर व नीचे पानी भरने की देग व भगोने रखे जाते थे। दरवाजे के ऊपर पूरी लम्बाई में लकड़ी का शेल्फ जिस पर कनस्तर रखे रहते थे। कमरा जीने के साथ था इसलिए कुछ अतिरिक्त जगह मिल गई थी। छह फुट की दीवार में अलमारियाँ थीं और उनके ऊपर टाँड था जहाँ ट्रंक रखे रहते थे। ऊँचाई सिर्फ इतनी थी कि बैठ सकते थे। सर्दियों में फंसकर तीन लोग सो भी सकते थे।
टॉयलेट सबसे नीचे तल्ले पर पुराने स्टाइल में बना हुआ, जहाँ मल को ढोकर ले जाया जाता था।शौचालय में एक पत्थर लगा हुआ….
उसमें एक बड़ा सा छेद,
पानी की कोई व्यवस्था नहीं। अपना तामलोट(पानी का लोटा जो सिर्फ शौचालय के लिए इस्तेमाल होता था) लेकर जाना… बिल्कुल संकरी सीढ़ियाँ और घर में इतनी भी जगह नहीं कि यदि कहीं जाना हो तो साड़ी भी बदल ली जाए।
सुबह सवेरे उठकर चार बजे स्नान करना पड़ता था ताकि सबके उठने से पहले ही नहा लिया जाए।
नई- नई शादी हुई थी, तभी एक छोटा सा कमरा बनवाया था जिसमें एक सिंगल बैड के नीचे अलग से मोटे पाये लगवाकर काफी ऊँचा कर दिया गया था ताकि नवविवाहिता के ट्रंक उसके नीचे रखे जा सकें। शुक्र है कि ससुराल वाले सबसे ऊपर वाले तल्ले पर थे और सामने छत और जाल था। गर्मियों में उस मकान में रहने वाले पाँच परिवारों के सभी लोग छत पर सोते थे।
जो छोटा सा 8×10 फीट का नया कमरा बनवाया था। उसमें मायके से आया सिंगल बैड, ड्रेसिंग टेबल (बिल्कुलबैड से सटाकर) जिसके नीचे नाली थी जो सीधी ‘झोत’ में गिरती थी। ड्रेसिंग टेबल के बिल्कुल सामने मायके से आई गोदरेज की अल्मारी। दोनों में मुश्किल से चार फुट की दूरी। उतनी जगह में नहाना पड़ता था। उसमें नवविवाहित दंपत्ति सो जाते थे। किंतु बरसात में और सर्दियों में वह भी संभव नहीं था।
कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जिस लड़की के मायके में रहने वाले छह लोग हों और तीन अलग शौचालय और तीन स्नानघर हों, वो ऐसे घर में जाएगी जहाँ स्नानघर नाम की चीज का तो अता पता ही नहीं है, और शौचालय भी ऐसा जिसमें कम से कम 30 लोग शौच के लिए जाते थे और वह भी पुराने स्टाइल का बना हुआ। शुक्र है कि उसमें बिजली नहीं थी। यदि होती तो शायद सारा दिन उल्टियाँ करते ही बीत जाता। ऐसा माहौल कभी देखा नहीं था।
माता- पिता को भी घर के बारे में कुछ नहीं मालूम था। उन्होंने शुभम को उनके ऑफिस में देखा था। रौबदार चेहरा, आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी, और रुआबदार पद। माता- पिता को लड़का पसंद आ गया। बुआ जी के जेठ ने बताया था।सारी बातें उनके माध्यम से होती थीं। उन्होंने बता दिया था कि घर में कमाने वाला केवल वही है और घर की पूरी जिम्मेदारी उसी के ऊपर है। वह घर का सबसे बड़ा लड़का है जिसके पिता की मृत्यु 5 वर्ष पहले हो चुकी है और अपनी तथा छह बहन भाइयों की जिम्मेदारी उसी के सर पर है।
माता-पिता को मालूम था कि उनकी बेटी के क्या सपने थे? बचपन से ही सपने थे कि एक ऐसा गाँव बसाऊँ जहाँ सब सुखी हों। जहाँ सारी बुनियादी सुविधाएँ हों। वह उस गाँव को एक सुंदर सुशिक्षित नगर में परिवर्तित कर सके। माँ ने यही कहा- ‘अब तेरी तमन्ना पूरी होने जा रही है। तेरा ससुराल भी किसी छोटे-मोटे गाँव से कम नहीं है। अब वहाँ अपनी यह इच्छाएँ पूरी करना।’ बेटी ने इसे चुनौती के रूप में लिया।
बस एक ही बात का अफ़सोस था। मायके में किताबें या अखबार पढ़ने पर बिल्कुल भी प्रतिबंध नहीं था। जितनी मर्जी किताबें पढ़ो।
नियमित रूप से शक्तिपुत्र, राजा भैया, चंपक, चंदामामा, सरिता, कादंबिनी, कल्याण पत्रिका, सभी प्रकार की ऐतिहासिक पुस्तकें आती थीं।कमरे की एक दीवार में सिर्फ पुस्तकें रखने के लिए अलमारी बनी हुई थी ,जो पुस्तकों से ठसाठस भरी रहती थी। किंतु ससुराल में किताबों या उपन्यास की तो बात ही छोड़ो, अखबार पढ़ना भी कत्ल करने जैसा अपराध समझा जाता था। एक यही बात दिल को सालती थी। मायके में कभी बड़े-बड़े पीतल के बर्तन साफ नहीं किए थे, जो ससुराल में करने पड़ते थे। मायके में मिर्च इमामदस्ते में कभी नहीं कूटी थी। नौकर मसाले पीस देता था। मायके में कभी गेहूँ साफ नहीं किये। रजाई में धागे कभी नहीं डाले। ये काम बाजार में करवाया जाता था; लेकिन ससुराल में वह भी किया, और सब कुछ हँसी-खुशी किया। यह सोचकर किया कि सुविधाओं में रहते हुए तो हम अभावों में जीने की बातें कर लेते हैं ;लेकिन सही मायनों में अभावों में रहकर खुशी से जीना और सभी की खुशी के लिए जीना ही तो सही मायने में जीना है।

-राधा गोयल
विकासपुरी (दिल्ली)

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