निष्ठा अपने नाम को सार्थक करने वाली एक जिम्मेदार बेटी थी। उसके पिता ने अपने व्यवसाय की हर बारीकी उसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में सिखाई थी। जब भी वे किसी काम से बाहर जाते, कई दिनों तक निष्ठा अकेले ही पूरे व्यवसाय का संचालन कर लेती थी। उसके पिता को इस बात पर गर्व था कि उन्हें बेटी के रूप में एक योग्य उत्तराधिकारी मिला है।
ऐसा नहीं था कि उनका बेटा नहीं था। बेटा था, रोहन। परन्तु उसकी रुचि केवल खेल-कूद, दोस्तों के साथ घूमने-फिरने और पार्टियों तक ही सीमित थी। पिता ने उसे कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन उसकी माँ हमेशा यह कहकर उसका पक्ष ले लेती कि समय आने पर वह सब कुछ सीख जाएगा।
एक दिन अचानक निष्ठा के पिता को दिल का दौरा पड़ा और उनके शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। अब वे पूरी तरह बिस्तर पर आ गए थे। रोहन और उसकी माँ का रो-रोकर बुरा हाल था, लेकिन निष्ठा ने धैर्य नहीं खोया। उसने न केवल स्वयं को संभाला, बल्कि अपने पिता के पूरे व्यवसाय की जिम्मेदारी भी कुशलतापूर्वक सम्भाल ली।
कुछ दिनों बाद निष्ठा ने रोहन को कार्यालय बुलाया। उसने उसे स्थिति की गंभीरता समझाते हुए कहा, “एक दिन मेरी शादी हो जाएगी और मुझे इस घर से जाना होगा। तब व्यवसाय भी तुम्हें संभालना होगा और परिवार भी। पापा की स्थिति तुम देख ही रहे हो। ऐसे में अब सबकी उम्मीदें तुमसे जुड़ी होंगी।”
यह सुनकर रोहन की आँखों में आँसू आ गए। उसने अपनी बहन से वादा किया कि वह व्यवसाय के सभी काम सीखेगा और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाएगा।
उस दिन के बाद से रोहन प्रतिदिन कार्यालय जाने लगा। वह हर कार्य मन लगाकर सीखने लगा। जहाँ कोई कठिनाई आती, वह निष्ठा से पूछता और उसका समाधान समझता। धीरे-धीरे वह व्यवसाय की बारीकियों में निपुण होने लगा। यह देखकर निष्ठा को संतोष था कि उसका छोटा भाई अब सचमुच बड़ा हो गया है।
लगभग छह महीने बाद निष्ठा के पिता का स्वास्थ्य काफी सुधर गया और उन्होंने फिर से कार्यालय आना शुरू किया। निष्ठा ने उन्हें यह नहीं बताया था कि रोहन अब नियमित रूप से कार्यालय का काम संभाल रहा है। जब वे कार्यालय पहुँचे और उन्होंने रोहन को पूरी लगन और जिम्मेदारी के साथ काम करते देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। पिछले कुछ महीनों में उसके द्वारा किए गए कार्यों और उसकी कार्यशैली को देखकर उनकी आँखें खुशी से भर आईं। उन्होंने रोहन को गले से लगा लिया।
रोहन ने भावुक होकर कहा, “पापा, यह सब दीदी की वजह से संभव हुआ है। उन्होंने ही मुझे मेरे उत्तरदायित्वों का एहसास कराया और मुझे आपके सामने सिर उठाकर खड़े होने योग्य बनाया है।”
यह सुनकर पिता की आँखें नम हो गईं। उन्होंने स्नेह से रोहन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, जीवन में उत्तरदायित्व का बोध ही व्यक्ति को परिपक्व बनाता है। परिस्थितियाँ अक्सर हमें वह सिखा देती हैं, जो उपदेश नहीं सिखा पाते। परिवार की असली ताकत धन-दौलत में नहीं, बल्कि उन संस्कारों में होती है जो कठिन समय में हमें अपना कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देते हैं।”
इतना कहकर उन्होंने रोहन और निष्ठा, दोनों को अपने सीने से लगा लिया। उस क्षण उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनके संस्कार और उनका परिवार, दोनों सुरक्षित हाथों में हैं।
-गोपेश दशोरा
उदयपुर (राजस्थान)
