अनुमति हो तो फ्रंट पेज पर
इसी अंक में गीत छाप दें।
देर रात को फोन लगाना
संपादन की मजबूरी है।
कितना प्यारा लिखा आपने
भाषा इसकी संतूरी है।
बदले में कुछ नहीं चाहिए
पल दो पल का साथ आप दें।
ऑन लाइन हो मैसेंजर पर
सोचा मन की बात बता दें।
ऑफिस या फिर घर आ जाएँ
हमें बशर्ते आप पता दें।
ढोलक बनकर बजते हैं हम
गर हाथों से हमें थाप दें।
इधर-उधर दिन कट जाता है
रात बहुत पड़ती है भारी।
ऐसे लगता अरमानों पर
चला रहा हो कोई आरी।
मन का बाग हरा हो जाए
नेहिल पल को चलो ताप दें।
सबके सब मतलब परस्त हैं
एक तुम्हीं से मन जोड़ा है।
हर चेहरे पर मर-मर जाते
नहीं किसी का दिल तोड़ा है।
प्रेम प्रबल है चौथेपन में
इसको उसको किसे शाप दें।
-मनोज जैन
