“संवेदना का हास : एक आत्ममंथन”

मानव सभ्यता का सबसे पुरातन धर्म करुणा है। पर आज करुणा के स्वर धीमे पड़ गए हैं। महानगर की भीड़ में मनुष्य, मनुष्य को देखकर भी अनदेखा कर देता है। यह मात्र उदासीनता नहीं, संवेदना का हास है।

“हास के कारण”
प्रथम, प्रौद्योगिकी का वर्चस्व। आभासी जगत ने यथार्थ के स्पर्श को क्षीण कर दिया। पीड़ा अब दृश्य है, अनुभूति नहीं। द्वितीय, प्रतिस्पर्धा का उन्माद। कालचक्र इतना तीव्र हो गया कि ठहर कर किसी का अश्रु पोंछने का अवकाश ही नहीं रहा। तृतीय, भय की छाया। ‘सहायता करोगे तो प्रश्नों के घेरे में आओगे’ – इस आशंका ने समाज को तटस्थ दर्शक बना दिया।

“उत्थान का पथ”
संवेदना मरती नहीं, सुषुप्त हो जाती है। उसे जगाना होगा। नित्य कुछ क्षण मौन के – जब नेत्र स्क्रीन से हटकर नेत्र में झांकें। नित्य एक संकल्प – भीड़ में प्रथम चरण मैं बढ़ाऊँगा। नित्य एक आचरण – सामर्थ्य भर किसी का भार बाँट लूँगा।

शास्त्र वचन है – “परोपकाराय सतां विभूतयः”। सज्जनों की समृद्धि परहित के लिए ही होती है। जब तक ‘अहम्’ से ‘वयम्’ की यात्रा नहीं होगी, तब तक समाज का हृदय स्पंदित नहीं होगा।

समाज का प्राण वही है – परपीड़ा को अपनी पीड़ा मान लेना। संवेदना का पुनर्जन्म इसी क्षण होगा, जब हम देखने के साथ-साथ देखभाल भी करने लगेंगे।

-आनंद पाण्डेय “केवल”

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x