संवेदनहीन होता समाज : कारण व समाधान

गणतंत्र दिवस की परेड टी.वी. पर देख रही थी तो उत्साह, उमंग, रोमांच और गर्व-बोध की भावनाएँ एक साथ उमड़ पड़ीं। कभी आँखें भींगी, तो कभी नम हुईं। बस, मन में यही कामना कर रही थी कि, “ईश्वर! मेरे देश के गौरव को सदा अक्षुण्ण रखना।”

न जाने क्यों जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मन की गहराइयों में अंकित देशभक्ति की भावनाएँ हमेशा जीवित रहती हैं। स्वतंत्रता सेनानी दादाजी के मुख से शहीदों और लोगों के त्याग व बलिदान की अनेक कहानियाँ सुन चुकी हूँ। अतः जब भी कोई नेता या व्यक्ति देश की गरिमा या उसकी अस्मिता पर सवाल उठाता है, मेरा हृदय दुःख से भर जाता है।

परेड देखने के बाद आने वाली हर खबर अच्छी नहीं थी। देश के गणतंत्र और लोकतंत्र को चुनौती देती घटनाओं ने मन को आंदोलित कर दिया। वर्तमान घटनाओं ने बहुत से सवाल उठाए हैं—देशभक्ति क्या है? मानवता किसे कहते हैं? राष्ट्रीय गरिमा और अस्मिता की सीमाएँ लाँघती अनैतिकता क्या सहज ही स्वीकार्य हो सकती है?

यह बात मन को बहुत दुखी करती है कि राष्ट्रीय पर्व पर तिरंगे का अपमान हुआ, और कुछ क्षुद्र स्वार्थी तत्वों ने हिंसा की। इस पीड़ा ने हर देशवासी के मन को छुआ है।

हमारे स्वतंत्रता सेनानी नेताओं ने लोकतंत्र के देश में ऐसा होगा—यह तो नहीं सोचा था। आज देश में महिलाएँ असुरक्षित हैं, बच्चों का भविष्य अधर में है। आए दिन नृशंस हत्याएँ, आतंक और विरोध के स्वर गूँज रहे हैं। इन घटनाओं का प्रतिकार करने वाले ही दंडित हो रहे हैं और न्याय की आशा धूमिल होती जा रही है।

हम कौन-से समाज में जी रहे हैं? बुद्ध, गौतम, नानक और ईसा की करुणा व मानवता के देश में संवेदनहीनता एक बड़े अभिशाप की तरह है। हमें आवाज़ उठानी होगी। हर अन्याय के खिलाफ अपने हक की लड़ाई लड़नी होगी।

युवा साथियों, अब आपकी बारी है। जागो—चुनौतियों को अपनी प्रतिभा एवं साहस से विजित करो। ओबामा ने जो कहा, वह गलत नहीं था। धर्म के नाम पर देश को मत बँटने दो।

जय हिन्द!

-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर

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