आइना अगर सच बोलता है, तो वो सच तुमको सुनाई क्यों नहीं दिया,
यहाँ कितने दिल बेज़ार हैं, तुम्हें उनका दुःख दिखाई क्यों नहीं दिया?
तुम समेटते रहे खुद में ही अपनी सारी खुशियाँ और दौलत,
किसी बेबस के आंसुओं को पोंछने का, खुद को अवसर भाई क्यों नहीं दिया?
तुम दाता तो दूर, एक हमदर्द भी न बन पाए किसी के लिए,
तुम्हारे भीतर के ‘अहम’ ने, तुम्हें कुछ भी करने नहीं दिया।
कहते हो कि दुनिया के झंझटों ने तुम्हें बांध रखा है,
तो बन जाते जोगी, क्यों इस वैराग्य को खुद में उतरने नहीं दिया?
इस जग के रंगमंच पर अकारण तो नहीं आए हो तुम,
फिर स्वार्थ के इस जाल ने, तुम्हें सही कर्म करने क्यों नहीं दिया?
जब जानते हो तुम सिर्फ एक मोहरा हो, और डोर किसी और के हाथ है,
तो सौंप कर खुद को उस विधाता को, आगे कदम बढ़ने क्यों नहीं दिया?
कभी फुर्सत में बैठकर सोचा है कि ये जीवन की दिशा किधर जा रही है?
साँसें घट रही हैं रोज़, और भटकती रूह बस यूँ ही जिए जा रही है।
अगर धुंधली है मंज़िल और रास्ते भी अनजान लग रहे हैं,
तो समय रहते किसी प्रबुद्ध से, तुमने मार्गदर्शन क्यों नहीं लिया?
-डॉ मंजू तिवारी
