हाए! किसके लगाव में आकर
चढ़ गये टूटी नाव में आकर
अब वे सारे ख़िलाफ़ हैं मेरे
जो खड़े थे बचाव में आकर
फूटते जा रहे हैं गुब्बारे
जाने किसके दबाव में आकर
तेरी मौजूदगी को माँगा है
मैंने तेरे अभाव में आकर
भूल जाएँगे हर लड़ाई को
शाह अपने पड़ाव में आकर
देख लें आपको जो करना हो
कह दिया मैंने ताव में आकर
अब दीवारों ने आँखें माँगी हैं
तेरी बातों के चाव में आकर
हम नहीं ख़ुदकुशी की सोचेंगे
हँस पड़ेंगे तनाव में आकर
बक रहे हैं न जाने क्या ‘अनमोल’
अपने मन के बहाव में आकर
-के. पी. अनमोल
