सोमवार की कथा

(सोमवती अमावस्या)

आओ आओ एक बात बतायें,
सोमवार की कथा सुनाएं,
कहती थी दादी और नानी,
उनकी कहानी मेरी जुबानी।।

एक गांव की बात पुरानी,
मां बेटी और बहू सयानी,
पूजा करती तीनों मिलकर,
रहती थी तीनों हिल मिलकर।।

एक थे गुणी साधु बाबा,
रोज भिक्षा मांगने आते,
अपने आशीर्वचनों से,
सबके मन को खुश कर जाते।।

बहू को आशीष देते,
“दूधो नहाओ पूतो फलो,”
बेटी से है हरदम कहते,
“धर्म बढ़े गंगा स्नान”।।

एक दिन बेटी बोली मां से,
एक बात है सच तो बताओ,
अलग-अलग आशीष मिलता,
क्या कारण है ये तो बताओ।।

माता बोली में क्या जानू,
यह तो साधू बाबा जाने,
और एक दिन माता भी फिर,
साधु से कारण लगी पूछने।।

साधु बोले सुन मैया तू,
एक बात है तुझे बताऊं,
बेटी का सुहाग है खंडित,
तभी ऐसा आशीष दे जाऊं।।

माता बोली साधु बाबा,
कुछ उपाय अब आप बताएं,
ताकि मेरी बेटी भी,
अखंड सौभाग्यवती हो जाए।।

साधु बोले तेरे गांव में,
रहती है एक सुम्मा धोबन,
बेटी से कहना वह जाकर,
उसकी सेवा करे प्रतिदिन।।

कुछ न बन सके यदि तो,
जाकर झाडू बुहार करे,
उसके गधे जहां बंधते हो,
वहां की वो टहल करे।।

वह है पतिव्रता एक नारी,
आशीष इसको को दे देगी,
तेरी बेटी भी फिर मैया,
अखंड सुहाग पाएगी।।

दूसरे दिन से बेटी भी फिर,
धोबिन के घर जाने लगी,
उसके घर की साफ सफाई,
प्रतिदिन वह करने लगी।।

धोबी धोबिन दोनों ही फिर,
अचरज में पड़ने लगे,
कौन करता है रोज सफाई,
बैठकर वह सोचने लगे।।

राज जानने की खातिर फिर,
धोबिन छिपकर बैठ गई,
ज्योंही बेटी घर में आई,
उसे पकड़ने दौड़ पड़ी।।

हाथ पकड़ कर धोबिन बोली,
लगती तुम भले घर की,
टहल करने क्यों हो आती,
बात बताओ राज की।।

लड़की ने साधु बाबा की,
बात का बखान किया,
फिर धोबिन ने आशीष देकर,
लड़की को है विदा किया।।

लड़की के घर धोबिन आकर,
उसकी मां से कहने लगी,
एक काम मैं तुझे बताऊं,
जरूर कर लेना सखी।।

इसकी शादी जब भी होवे,
एक बात याद रखना,
इसके फेरों के समय,
मुझको भी बुलवा लेना।।

अपना आशीष देकर मैं,
सौभाग्य इसको दे दूंगी,
और तेरी बेटी को,
सौभाग्यवती बना दूंगी।।

विवाह की शुभ-बेला आई,
धोबिन को निमंत्रण भेज दिया,
धोबिन ने भी जाते-जाते,
घरवालों से बोल दिया।।

मेरी गैर हाजिरी में यदि,
मेरे पति मृत हो जाये,
जब तक मैं भी आ न जाऊं,
क्रिया-कर्म कोई कर न पाए।।

जिस समय सुम्मा धोबन ने,
बेटी को सुहाग दिया,
उसी समय उसका पति,
मृत अवस्था को प्राप्त हुआ।।

परिजन बैठकर लगे सोचने,
सुम्मा घर जब आएगी,
बहुत विलाप करेगी वह तो,
अथाह दुख पाएगी।।

बोले वे सब देखो मिलकर,
एक काम किया जाए,
उसके घर आने से पहले,
धोबी का क्रिया- कर्म हो जाए।।

धोबी के मृत शरीर को,
श्मशान वे ले जाने लगे,
राह में थी सुम्मा धोबन,
देखकर वे रुक गये।।

सुम्मा बोली क्या हुआ,
ये किसको तुम ले जा रहे,
बोले मृत शरीर तेरे पति का,
दाह-क्रिया करने जा रहे।।

अपने पति के मृत शरीर को,
सुम्मा ने उतरा लिया,
पीपल के पेड़ के नीचे,
उसको तो रखवा दिया।।

लड़की की मां ने सुम्मा को,
मिट्टी का करवा था दिया,
सुम्मा ने पीपल के नीचे,
एक सौ आठ टुकड़ों में फोड़ दिया।।

पति व्रत धर्म का ध्यान कर,
शिव-पार्वती की पूजा की,
पीपल के पेड़ की पूरी,
एक सौ आठ परिक्रमा की।।

इसके बाद सुम्मा धोबन ने,
अपनी तर्जनी उंगली को चीर दिया,
पति के ऊपर रक्त छिड़क कर,
उसको जिंदा कर दिया।।

इस व्रत की है इतनी महिमा,
जो स्त्री इसको करती है,
देवी मां की कृपा बरसती,
अखंड सौभाग्यवती वो रहती है।।

कार्तिक के महीने में देखो,
सोमवार का व्रत कीजे,
पहले में तो धान पान से,
एक सौ आठ परिक्रमा कर लीजे।।

दूजे सोमवार दूध से,
तीजे में वस्त्र से कर लीजे,
चौथे में धातु के बर्तन से,
108 परिक्रमा कर लीजे।।

किंतु एक बात है मेरी,
सदा ही ये ध्यान रखिए,
सबसे ऊपर श्रद्धा भक्ति,
ईश्वर को मना लीजे।।

-साधना छिरोल्या
दमोह (मध्यप्रदेश)

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