तेरी आँखों में जो देखा, वो नज़ारा और था,
जिसे दुनिया इश्क़ कहती है, हमारा और था।
तेरी आवाज़ की ख़ुशबू से महक उठता था दिल,
यूँ तो मौसम भी कई थे, पर इशारा और था।
रात भर चाँद से करते रहे तेरी ही बात हम,
चाँद खामोश था लेकिन दिल का तारा और था।
तेरी यादों ने बचाए रखा तन्हाई में भी,
डूबने वाले को तिनके का सहारा और था।
हमने चाहा था तुझे रूह की गहराई से मगर,
तेरी चाहत का शायद कोई धारा और था।
अब भी एहसास तेरे नाम से धड़क उठता है,
वक़्त बदला है मगर दर्द हमारा और था।
यूँ तो “विनीत” ने हँसकर सभी सदमे सह लिए,
दिल के अंदर जो पसरा था, वो फ़साना और था।
-विनीत कुमार राय
