आरम्भिका-

और अब पैदल नहीं, उड़ना जरूरी हो गया।
यूँ लगे जैसे कि अब, मरना जरूरी हो गया।।

बोध-1
बेअदब-बकवास, सुनने को हुए मज़बूर हम।
इसलिए उस भीड़ से,हटना जरूरी हो गया।।

बोध-2
ख़ूबसूरत फूल,भौंरों के खिलौने हो गये।
किस तरह खुशबू बचे,बचना जरूरी हो गया।।

बोध-3
व्यर्थ के भूचाल, पलकों पर लदे हैं दोस्तों।
वक़्त के अनुसार कुछ,करना जरूरी हो गया।।

बोध-4
उत्तरों के संग्रहालय, जल रहे जब आग में।
फिर लिखो,लिखते रहो; लिखना जरूरी हो गया।।

अन्तिका-
रूप’श्रीमाली’ न जाने, कौन सा ज़ादू करे।
दर्पणों को मंच पर, रहना जरूरी हो गया।।

-बृज राज श्रीमाली
ग्राम बंजरिया, झिलाही बाज़ार
मनकापुर-गोण्डा।

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