प्रतिस्पर्धा

प्रतिदिन की भांति आज भी वीर, शहर के खेल मैदान में दौड़ने के लिए चला गया।
जिले में 1500 मीटर के दौड़ की प्रतिस्पर्धा होने वाली थी।
इस प्रतिस्पर्धा में 1500 मीटर के दौड़ को समय पर पूरा करने वालों की पुलिस में नौकरी पक्की थी।
वीर इस स्पर्धा में विजय श्री हासिल करने का लक्ष्य बना रख्खा था।
स्पर्धा के 30 दिन बाकी रह गए थे।
वीर दौड़ के इस अभ्यास में मग्न हो परिश्रम कर रहा था।
एक घंटे के अभ्यास के बाद वीर अपनी घर की ओर निकला।
बीच रास्ते एक मोहल्ला पड़ता था।
उस दिन का दुर्भाग्य!!!
वीर जैसे ही मोहल्ले में प्रवेश किया कि एक आवारा कुत्ता पीछे चुपके से आकर वीर के एक पांव को दांतों से जकड़ कर नोच लिया।
वीर दर्द से विल विला उठा और पीछे मुड़कर देखा तो एक आवारा कुत्ता उसके पैर में एक बड़ा घाव कर भाग गया।
एक मोटरसाइकिल वाले राहगीर से सहायता मांग वीर सीधे अस्पताल पहुंच गया।
खबर सुनकर वीर के दोस्त भी आ गए और फिर मरहम पट्टी के साथ- साथ एंटी रेबिज की सूई भी लेनी पड़ी।
दूसरी ओर वीर के आने का समय जानकर वीर की माँ ने बादाम मिला दूध तैयार कर वीर के आने का इंतजार कर रही थी।
कुछ वक्त और गुजरा कि वीर को लेकर वीर के दोस्त वीर के घर आए।
वीर के पैर में पट्टी और वीर को लंगड़ाता देख वीर की माँ बदहवास सी हो गई।
रोते हुए वीर की माँ ने वीर से पूछा?
क्या हुआ बेटा?
यह कैसी पट्टी है तेरे पैर में।
वीर ने अपनी माँ को घटना का सारा वृतांत बताते हुए कहा।
चिंता मत करो माँ।
दौड़ प्रतिस्पर्धा के 30 दिन शेष हैं।
पंद्रह दिनों में घाव भर जाएगा और मैं प्रतिस्पर्धा में भाग लेकर अपना लक्ष्य भी हासिल कर लूँगा।
वह समय भी आया।
1500 मीटर की राज्यस्तरीय दौड़ प्रतिस्पर्धा हुई जिसमें वीर प्रथम स्थान पाकर अपना लक्ष्य हासिल कर लिया।।
हौसले की जीत हुई।।

-अजय पाण्डेय बेबस

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