स्कूल में सालाना दौड़ प्रतियोगिता थी। सबकी नज़रें कक्षा 8 के रोहन पर थीं। वो पिछले तीन साल से गोल्ड मेडल जीत रहा था। इस बार उसका मुकाबला नए आए अमन से था। अमन दुबला पतला था, पर आँखों में अजीब सी चमक थी।
सीटी बजी। रोहन हवा से बातें करने लगा। अमन भी पीछे नहीं था। आखिरी चक्कर में रोहन आगे था, जीत बस दो कदम दूर। तभी उसने देखा, अमन लड़खड़ा कर गिर पड़ा। घुटना छिल गया, खून निकल आया।
रोहन के पास दो रास्ते थे। गोल्ड मेडल या अमन का हाथ। एक पल को वो रुका। स्टेडियम में सन्नाटा। फिर वो पीछे मुड़ा, अमन को उठाया और बोला, “चल भाई, साथ में पूरी करते हैं।”
दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और धीरे धीरे फिनिश लाइन पार की। पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा।
उस दिन गोल्ड मेडल तीसरे नंबर वाले मोहित को मिला। पर प्रिंसिपल ने माइक पर कहा, “आज की असली दौड़ रोहन जीत गया। प्रतिस्पर्धा दूसरों को हराने में नहीं, खुद को बेहतर बनाने में है।”
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
