“वह शाख”

धूप पत्तों के कंधों पर उतरती है,
ओस सुबह की पहली किरण के साथ चुपचाप चमक उठती है
तने पर समय की कुछ और रेखाएँ उभर आई हैं
ऋतुएँ अपनी पूरी छटा के साथ आती हैं,
और जीवन अपनी परिपक्व उजास में धीरे-धीरे खिलता रहता है…

फिर भी…
कभी-कभी,
न जाने किस हवा के स्पर्श से, दृष्टि अनायास उस दिशा में चली जाती है
जहाँ कभी एक शाख हुआ करती थी…

उस शाख पर
कुछ मौसम अपने उजले रंगों में खिले थे,
कुछ दोपहरें धूप के सुनहरे सिक्कों-सी पत्तों में खनकती थीं,
कुछ स्वर घोंसलों की तरह बसे थे,
कुछ अक्षर तितलियों की तरह एक पत्ती से दूसरी पत्ती तक उड़ते रहते थे…
और एक उम्र…
निश्चिन्त, निर्भार, अपने ही आकाश में धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी..

न जाने कैसे बची हुई है-
हवा की गंध,
धूप का रंग,
और उन दिनों की हँसी की हल्की-सी प्रतिध्वनि भी
बस…
उन तक पहुँचने वाली पगडंडियाँ
धुँधली पड़ गई हैं…

अनुपस्थितियाँ भी कितनी जीवित होती हैं
समय बीतता रहता है,
पर वे मन के किसी कोने में उसी उम्र की बनी रहती हैं
जड़ों के पास धूप देर तक बैठी रहती है

और फिर कभी-कभी…
स्मृति का एक पक्षी उसी रिक्त दिशा की ओर उड़ जाता है,
जहाँ कभी एक शाख हुआ करती थी…
तब लगता है-
कुछ शाखें टूटती नहीं,
बस दृष्टि से ओझल हो जाती हैं..

पर उनकी स्मृति
लकड़ी के रेशों में,
पत्तों की सरसराहट में,
और हवा की धीमी थिरकन में
कहीं न कहीं सदैव उपस्थित रहती है
और शायद इसी कारण,
कभी-कभी हवा एक अनुपस्थित शाख को भी धीरे से हिला जाती है…

-अमिता श्रीवास्तव

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