टूट अस्मत के ताले गए
डाके रिश्तों में डाले गए
धर्म की खौलती देग़ में
आज इंसा उबाले गए
कुर्सियाँ पेट भरती रही
मुफलिसों के निवाले गए
बंद करने शिकायत का मुँह
चंद सिक्के उछाले गए
इस तरह से बसा है शहर
घर के भीतर से नाले गए
ज़िन्दगी दर्द का है सफर
पाँव से किसके छाले गए
है विधायक के घर रौशनी
बस्तियों से उजाले गए
ज़िन्दगी भर जो पूरे न हो
ख्वाब आँखों में पाले गए
-दिनकर राव दिनकर
