रंग तुमने प्यार के देखे ही कब।
ग़ैर ही थे तुम हमारे थे ही कब।
आ ही जाती तुमको भी शर्मोहया।
तुम हमारे रूबरू बैठे ही कब।
ख़ैरमक़दम था तुम्हारा भी यहां।
तुम बुलंदी से मगर उतरे ही कब।
किस तरह ख़ुशियां तलाशें हम नई।
हम पुराने इश्क़ को भूले ही कब।
वो कहीं तहरीर में उलझे रहे।
वो जुबां जज़्बात की समझे ही कब।
चांद थे वो ये चलो माना मगर।
वो हमारी बज़्म में चमके ही कब।
लौट आता वक़्त भी “कमलेश” का।
तुम मगर जा कर यहां लौटे ही कब।
-कमलेश श्रीवास्तव
