जो पास न हो साथ कहां दे नहीं सकता,
बीमार को हर हाल दवा दे नहीं सकता ।
वो छोड़ गया राह सफ़र में थी जरूरत,
अब दूर से सांसों को हवा दे नहीं सकता ।
तकदीर का मारा रहा टूटी लकीर थी,
वो चाह कर प्यारा जहां दे नहीं सकता ।
लाखों मिले वैसा कोई मिलता ही कहां है,
हर रोज कोई मुझको सदा दे नहीं सकता।
है ज़ख्म तो पैरों में सफ़र क्या ही भरोसा,
मैं साथ चलूं यार वफ़ा दे नहीं सकता ।
कट तो रही है जिंदगी एहसान करम से,
कब तक चले ये साथ वफ़ा दे नहीं सकते।
पैगाम कलम दे” अली” समाज के हित में,
सच्ची दलीलों पर तो सजा दे नहीं सकता।
-अली अंसारी “अलि”
