मेरे अंतर्मन,
वैसे तो तुम सदा से मेरे साथ हो, तुम्हारी बातें हमेशा सुनी भी है, परंतु तुम्हें कभी कुछ कहा नहीं। कभी मौका नहीं मिला कभी फुर्सत नहीं मिली, परंतु आज यह मौका और फुर्सत दोनों है इसलिए तुमसे बातें करते वक्त मैं बहुत खुश हूं।
जब से होश संभाला जिंदगी बस भागती रही, कभी पढ़ाई करने में, और कभी जिम्मेदारियां निभाने में। अनेक हालात ऐसे आए जहां लगा गलत करना ही सही है, परंतु मुझे गर्व है तुम पर कि तुमने मुझे कभी गलत राह चुनने नहीं दी। तुमने हमेशा मुझे अपनी जिम्मेदारियां निभाने और दूसरों को खुशी देने के लिए प्रोत्साहित किया, मेरे भीतर कभी विकारों को जमने नहीं दिया, इसके लिए मैं तुम्हारी आभारी हूं। सही मायने में ईश्वर की आभारी हूं कि उसने मुझे तुम्हारे जैसा विवेकशील अंतर्मन प्रदान किया सिर्फ तुम्हारी वजह से मैंने कभी दुनिया के कुछ कहने की परवाह नहीं की, बस तुम्हारा हाथ थामे जीवन की राह पर चलती चली गई और चल रही हूं, इस आशा के साथ कि तुम आगे भी मेरा हाथ थामे रहोगे।
तुम्हारी अंतरंग सखी
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
