वक्त अपनी चाल पर है
इंसान वही खाल पर है
अनसुलझे सवालों का ढेर
मुद्दे सारे बवाल पर है
दहशत में चल रही दुनियां
लगता है जैसे काल पर है
छीना झपटी मारा मारी
नजर सभी की माल पर है
लिखना चाहूँ तो ख्याल बहुत
सोच मेरी हर इक सवाल पर है
-किशोर छिपेश्वर “सागर “
बालाघाट
