माँ तो अनपढ़ थी लेकिन…

माँ तो अनपढ़ थी लेकिन
दुनिया की बात बताती थी
चाँद सितारे जंगल मिट्टी
आँगन तक आती थी
माँ तो अनपढ़ थी लेकिन
“माँ” कहना मुझे सिखाती थी

“क” से कबूतर “ल” से लड़की
माँ से ही तो सीखा था
घर बाहर का गणित लगाते
माँ को मैंने देखा था
तीज और त्यौहार वो सारे
उंगली में गिन लेती थी
खरी बहुत थी लेन देन की
आना भी सोच के देती थी
बाबूजी का पैसा रूपया
कितना कैसे आता था
बजट बनाती वैसा घर का
कुछ कमता न बढ़ जाता था
माँ तो अनपढ़ थी लेकिन
शिक्षा का मोल बताती थी

दुनिया देश की सारी बातें
आधी समझ वो पाती थी
अपने भीतर तोल मोल फिर
पूरा हमें बताती थी
सोना,चाँदी, तोला आना
रत्ती, भार कहाँ कितना
हमको तो ये ज्ञान सदा ही
रहा यहाँ न के जितना
पर माँ को समझ सब आता था
क्या कैसे तौला जाता था
सारे बही और सब खाते
बेबस माँ के आगे थे
फटा कटा सब सिल देती
करुणा के पावन धागे थे
माँ तो अनपढ़ थी लेकिन
घर की सरकार चलाती थी।

-प्राची मिश्रा

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