मान की सम्मान की हमने नहीं परवाह की।
ख़ुश रहें साथी हमारे बस इसी की चाह की।
इस दिल-ए-मासूम ने हर एक को अपना कहा,
ठोकरें खाई भले पर फ़िक्र थी बस राह की।
छल-कपट रचके बिछाए जाल अपनों ने सदा,
ख़्वाब जन्नत के दिखाए ज़िंदगी गुमराह की।
मतलबी हर एक रिश्ता मतलबी सारा जहां,
फ़िक़्र है किसको यहाँ पर अपने ही हमराह की।
जब न कोई कद्र ही करता है तो ‘संगीत’ फिर,
कौन देखेगा कि किसने इस कदर भी आह की।
-संगीता झा “संगीत”
(नई दिल्ली)
