पिता-परमेश्वर

पिता शब्द छोटा है,
पर उसकी छाया में
पूरा आकाश ढक जाता है।

वह परमेश्वर नहीं,
पर जब माथे पर हाथ रखता है
तो लगता है
सारे डर भाग गए।

उसकी डाँट में
वेद की ऋचा सी कठोरता,
उसके आशीष में
गंगा सी शीतलता।

थका हुआ कंधा उसका
मेरे लिए पहला मंदिर था,
जहाँ बिना माँगे
सब कुछ मिल जाता था।

परमेश्वर दूर लगता है कभी,
पर पिता की उँगली पकड़े
हर रास्ता अपना लगता है।

वह ईश्वर नहीं,
पर ईश्वर सा भरोसा है।
वह पिता है,
धरती पर चलता परमेश्वर।

माँगना नहीं पड़ता
हाथ जोड़ कर
बिन माँगे देता है
अपनी हैसियत भूलकर,

-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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