हमने
उन्हें बस पिता माना
कोशिश नहीं की
जानने की
वे क्या चाहते हैं?
उनके भीतर भी एक
मासूम सा बच्चा बैठा है
जो कि न सका अपना बचपन
अव्यवस्थाओं के रहते।
देखे थे उनकी आँखों ने भी
कभी ख्वाब खुशियों के
पूरे हो न सके जो
उड़ा ले गई जिम्मेदारियों की आँधी।
वे बनना चाहते थे बच्चा
अपने बच्चों संग
खेलना, हँसना चाहते थे
मगर हमने उन्हें केवल पिता जाना,
अपने जवान होते बच्चों संग
बाँटना चाहते थे
सपने अपने
मगर हमने उन्हें बस पिता माना,
समझा अपनी
जरूरत पूर्ति का साधन मात्र
जब दूर बहुत दूर चले गये पिता
तब समझ पाए
क्या चाहते थे पिता ।
-डॉ. लता अग्रवाल ‘तुलजा’
