भाग्य में बच्चों के लिखी है, ताज़ी रोटी।
पिता की क़िस्मत में पर लिक्खी, बासी रोटी।।
हाड़ तोड़ मेहनत कर जब वो, घर को आता।
देख के बच्चों के चेहरे, बच्चा बन जाता।।
बच्चे झट रख देते, कुछ इच्छाएं अधूरी।
पिता तसल्ली दे कहते, सब होंगी पूरी।।
हल्की सी मुस्कान, पिता फिर लब पर लाते।
और झोले से हाथी, गुड़िया उन्हें थमाते।।
यही मर्म है जीवन का तुम, झट पट सुन लो।
यही पिता का प्रेम फ़र्ज़ तुम, बच्चों गुन लो।।
धरती के भगवान पिता हैं, ‘दीप’ मान लो।
और अवनी है पालन कर्ता सत्य जान लो।।
-प्रदीप डीएस भट्ट
