रिमझिम फुहारें जब छिटकने लगीं,
पेड़ो, पत्तों, फूलों पर बिखरने लगीं।
हवाएं झूमतीं लहराकर चलने लगी,
धरती की हरी चूनर फिसलने लगी।
कुंज और कानन में ताज़गी जा गयी,
प्रकृति जैसे नींद पूरी कर जाग गयी।
मेघ नगाड़े बजाते, बिजली चमक गयी,
बड़ी तेज़ आवाज़ से सिहरन हो गयी।
मोर नृत्य करते, पंछी आनंदित होते,
ताल-तलैया, झरने, नदियां, भर जाते।
बच्चे पानी में उछलते, भीगते-भागते,
छतरी,बरसाती ,बस्ता फेंकते-फाकते।
कबसे लगी है ये बारिश की झड़ी,
मां द्वार पर कितनी देर से है खड़ी।
सोचती है कोई आफ़त न आ पड़ी,
मुन्ना, बापू आएं, राहत मिलेगी बड़ी।
सबमें कैसा अलसपन बस गया है।
सूरज जाकर बादलों से ढ़ंक गया है।
सबेरा का उजाला किधर छिप गया,
एक ठंडक का एहसास भर सा गया।
बारिश का मौसम आ गया।
-डॉ अमृता शुक्ला
