जिन्दगी के कैनवास में कभी भी मौकों की कमी नहीं होती

(संस्मरण)

12 बर्ष की उम्र से शहर में रहकर पढ़ाई-‌लिखाई और फिर ग्रेजुएशन के बाद एम0 ए0 करने की सोचा, मगर इसके लिए दूर दूसरे शहर जाना पड़ता।
अंत में विचार आया कि अपने ही शहर में रहकर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी की जाए।
पिताजी चाहते थे कि जबतक कहीं कोई काम नहीं मिलता तबतक गाँव में रहकर खेती बाड़ी कराने की ओर ध्यान दो।
पर मेरा मन गाँव जाने से रोक रख्खा।
बेरोजगारी भी और शहर में रहना भी।
बहुत सोचने के बाद मैंने कुछ घरों में बच्चों का ट्यूशन ले लिया।
शहर खर्च की चिंता दूर हो गई।
साल भर का समर गुजरा होगा कि मैं एक प्राईवेट स्कूल में बतौर शिक्षक काम करने लगा।
अस्थायी बहाली थी।
छ:महीने बाद बहाली को नियमित करने के लिए मुझे स्कूल प्रबंधन के सचिव के पास दरख्वास्त देने को कहा गया।
मैं जब दरख्वास्त लेकर सचिव महोदय के पास पहुंचा तो वहाँ पहले से ही दो‌और‌ अभ्यर्थी बैठे थे और अखबार पढ़ रहे थे।
सामने सचिव भी बैठे हुए थे।
मैं सचिव के पास जाते ही मैं सेवा नियमितीकरण का आवेदन सचिव के हाथों दे दिया।
मेरा आवेदन पढ़ तुरंत सचिव महोदय ने सेवा नियमित करने की अनुशंसा कर आवेदन मुझको लौटा दिया।
मेरे शरीर में खुशी की लहर दौड़ गई।
सचिव महोदय को आभार प्रकट कर जैसे ही उनके आवास से निकलना चाहा कि पहले से बैठे अभ्यर्थियों की आवाज सुनाई दी।
दोनों सचिव महोदय से कह रहे थे।
हम दोनों भी इसी बहाली के लिए आए थे ।
सचिव महोदय ने नाराज होकर कहा।
आप दोनों घंटों से मेरे पास रह अखबार पढ़ते रहे लेकिन अपना मकसद जाहिर नहीं किया।
जाहिर होता है कि आप दोनों को कोई काम नहीं चाहिए था।
अब जब मैंने पाण्डेय जी के आवेदन को स्वीकृत किया तो आप दोनों की आंखें खुली।
अब कोई पद रिक्त होगा तो आप दोनों का सोचा जायेगा।
आप दोनों ने अपनी बेवकूफी से ये मौका खो दिया है।
मुझे लगा- जिन्दगी के कैनवास में कभी भी मौकों की कमी नहीं होती।
बशर्ते मौके को पहचान कर लाभ ले लिया जाए।
कल के भरोसे सब हाथ से निकल जाते हैं।
चार साल बाद फिर मुझे सरकारी विद्यालय में नौकरी लगी।
इति

-अजय पाण्डेय ‘बेबस’

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