ये प्रेम का कैसा रूप है!!
जो कुरूप हो रहा।
जहाँ,
हृदय संवेदना शून्य हो,
बना रहा कातिल,
रिश्तों का मर्यादाओं का संस्कृति का।
उच्चॠँखलता की पराकाष्ठा,
आधुनिकता की होड़ में लगी,
पाश्चात्य संस्कृति में लिपटी
युवा पीढ़ी।
आत्म -केन्द्रित होता मस्तिष्क,
बस अपना अभीष्ट पाने,
क्रूर से क्रूरतम होता जा रहा।
भौतिक सुखों की अदम्य चाह,
बस वर्तमान को भोग लेने की गगनछूती अभिलाषा,
कामनाओं की वेदी पर,
समिधा बन दग्ध होते मानवीय रिश्ते।
पति -पत्नि का पवित्र रिश्ता
खड़ा है प्रश्नों के परिधि मध्य
सात -जन्मों का बंधन क्यों
सात वर्ष भी बंधित नही होते!!
वासनाओं की धधकती ज्वार,
हृदय की पावनता को क्यों जला रही?
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति!!
ममता, करुणा, दया, पावनता, त्याग और बलिदान की प्रति मूर्ति
नारी का स्वरूप क्यों खंडित हो रहा??
ओ सृष्टा!!
तुम ये कैसी रचना कर रही हो?
कहाँ गया हृदय में करूणा का उमड़ता सागर।
अरे तुमने हथियार उठाया भी तो किस पर!!!!
ये कैसा वीभत्स रूप धरा!!
क्या पा लिया तुमने भी ?
किसी की गोद सूनी करके,
बुढ़ापे की लाठी तोड़कर,
बहन की राखी को रुलाकर,
अपनी ही सूनी माँग लिए भटकती
जा रही हो जीवन के कंटील पथ पर।।
उतार फेंको अपनी विद्रूपता
बहो,
निर्झर प्रेम का प्रतीक बनकर
नारी तुम अभिशप्त मत बनों,
सीता- सावित्री राधा के नाम को
सोनम -मुस्कान से आरोपित मत करो।
अपनी कठोरता का नाश करो!!!
-सुधा शर्मा
राजिम (छत्तीसगढ)
