दिल पर रही है जो गुज़र बताऊँ, कैसे
जख्म जो दिये अपनों ने दिखाऊँ, कैसे।
पीठ पीछे जो कुछ भी हुआ चलो हो गया
पर जो हुआ है सामने भूल जाऊँ, कैसे।
सुनी सुनाई बात पर यकीं करता नहीं हूँ
लेकिन आँख से जो देखा पचाऊँ, कैसे।
गर दिखाई ही न पड़ता तो और बात थी
नज़र आ रही मक्खी निगल जाऊँ, कैसे।
रह रह के उठता रहता है बवंडर गम का
ऐसी जिंदगी को बिताऊं तो बिताऊं, कैसे
दिल में तो काफ़ी कुछ रहा है उमड़ घुमड़
लेकिन जुबाँ पे अपनी वो सब लाऊँ, कैसे।
हूँ मैं तो अब भी वैसा ही, था जैसा पहले
विश्वास लोगों को लेकिन ये दिलाऊँ, कैसे।
अपने दिल को तो जैसे तैसे लेता हूँ संभाल
आँखों के आँसूओं को लेकिन छुपाऊँ,कैसे।
बंजर जमीन पर कभी लहलहायेगी फसल
यह विश्वास दिल पर अपने मैं जमाऊँ,कैसे।
होनी को भला कब कौन रोक पाया है’शर्मा’
मुकद्दर में जो है मेरे लिखा उसे टलाऊँ , कैसे।
-रामकिशन शर्मा
