हर तरफ बारिश हुई है मेरा घर सूखा रहा।
मैं फ़क़त बरसात के किस्से यहाँ सुनता रहा।
धूप ने फूँका है मेरा घर तुम्हारे हुक़्म से।
भीगता मौसम तुम्हारी ओट में दुबका रहा।
ओस के नन्हे समन्दर एक पत्ते पर लिए।
मैं हज़ारों मील रेगिस्तान में चलता रहा।
दिन दहाड़े आपने अग़वा किया सूरज मगर।
एक दीपक झौंपड़ी में रात भर जलता रहा।
बाज़ुओं पर लिख चुका है वो पसीने की कथा।
पत्थरों को तोड़ने वाला मगर भूखा रहा।
रास्ता बेजान सा कब से पड़ा है इस जगह।
भीड़ का रेला यहीं से उम्र भर आता रहा।
उस पुराने खँडहर को लोग भुतहा कह रहे।
जो समय की मार को सदियों खड़ा सहता रहा।
एक भी पँछी इधर से भूल कर गुज़रा नहीं।
एक पिंजरा बस मेरी दालान में लटका रहा।
मर गया “कमलेश” तो लोगों ने हँस कर ये कहा।
एक अच्छा आदमी था, मर गया अच्छा रहा।
-कमलेश श्रीवास्तव
