बात बेबात

बात बेबात के झगड़े
रूठना चिढ़चिढ़ाना
यूँ ही शामिल नहीं हुआ
जिंदगी में मेरी
मैं तो शोख चंचल
अल्हड़ सी थी !
जमाने ने लगा दी
मेरे हंसने मुस्कुराने
पे पाबंदी ।
सारी हसरतें दफन हो गई
दिल के दिल में ,,
बोझ रिश्तों का पड़ा भारी
शायद मेरी उम्र पे !!
बात बात पे सुनाया गया
हो गई है शादी
और छीन ली गई
मेरी सारी आजादी ।
अब हर बात में मेरी है
अदब है कायदा है
सीमित रसोई तक
मेरा दायरा है ।
कहती कम हूँ ,,
सुनती हूँ अब सबकी
कर नहीं पाती मैं
अब कुछ भी मनकी ।
शर्मो हया की
चादर में लिपटी हुई हूँ
खोजती हूँ
क्या वही मैं ही हूँ ।
बढ़ती गई खामोशी
पनपता गया लावा
चाहिये थी शायद मुझे भी
थोड़ी तरो ताजा सी हवा
बंद थे लेकिन दरवाजे
और झरोखे सारे ।
मन के गलियारे
राह तकते थे तुम्हारी
लेकिन इंतजार ही रहा जारी
प्यार कि जगह ले ली
आहिस्ता आहिस्ता
कर्त्तव्यों ने
बस चलती गई
गृहस्थी की गाड़ी ।
कल तुम व्स्त थे
आज मैं हो चुकी हूँ
अभ्यस्त अकेले पन की
अब जरूरत है तुम्हें
मेरे वक्त की ।
गुजर गया मेरे जीवन का
सुनहरा हिस्सा
तुम्हारे तंस उल्हानों की नजर
आज कोई भी बात
किसी तरह भी
नहीं करती है मुझपे असर ।
लोग कहते हैं
बड़ी पक्की हो गई हूँ मैं
मैं कोशिश में हूँ समझने की
क्या थी क्या हो गई हूँ मैं ||

-स्मृति गुप्ता
जबलपुर

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