“बाबूजी की छतरी”

बाबूजी की छतरी
खोई है कहाँ,
पता नहीं,
खोई तो क्या
रख दिया होगा अम्मा ने
सहेज कर
यहीं-कहीं,

पता है उसे
आज फोल्डिंग छातों के आगे/
“बाबूजी की धरोहर” की
क्या बिसात,
कौन समझता है/
आधुनिक युग में
पुराने असबाब और जज्बात,

लेकिन
ऐसा नहीं कदापि
मेरे जेहन में
अब भी कई बातें हैं,
कुछ यादें हैं छतरी की
और बहुत कुछ सौगातें हैं।

छतरी केवल छतरी नहीं
बाबूजी के जीवन का प्रकल्प थी,
बुढापे में
जब लड़खड़ाए पैर/
पीठ झुकी /यह छतरी ही
लाठी का विकल्प थी,

याद है मुझे
जब बाबूजी की
हिंदी की क्लास लग जाती थी,
मेरी पीठ पर कभी-कभी
बाबूजी की छतरी
तबियत का फट्टा लगाती थी,
तब पता नहीं था
मुँह से निकली आह
क्या लाभ दे पाएगी,
आज वही
बाबूजी की छतरी
मेरी कविता बन जाएगी।

ऐसा नहीं कि बाबूजी
बात-बेबात ही
नाराज हमसे होते थे,
सुना है
जब हम ननिहाल गए होते
बाबूजी रात-रात भर रोते थे,

बाबूजी का हम पर
विश्वास अटूट और
प्यार भी भरपूर था,
सही राह दिखलाने को
उन्हें छतरी पर
बड़ा गुरूर था,

जब पिकनिक पर
पगडंडी से
गुजरकर हम जाते थे,
बाबूजी
छतरी की हेकड़ी से
बेर-अमरूद टपकाते थे,

मालूम था पिकनिक के लिए अम्मा ने
पतली और मुलायम
चपाती बनाई थी,
लेकिन तब भी
बाबूजी की फलाहारी छतरी
मानो माँ की नर्म कलाई थी।

सभी भाई बहनों ने
छककर तब
बेर-अमरूद ही खाए थे,
कभी ख़ौफ़
रहा होगा छतरी का
पर उस दिन हमने
छतरी के ही गुण गाये थे।

तभी देखा
उथली नदिया के
बढ़ते पानी में वेग था,
कोई आ जाए चपेट में
फिर करता नहीं वह भेद था,

तभी ठिठके बाबूजी
मेमने की
सुन करुण आवाज,
बहते पानी में
बढ़ा दी छतरी
लेकर कुछ अंदाज,
प्राण बचे एक बेजुबान के
छतरी ने किया कमाल,
आज भी प्यारी है
छतरी बाबूजी की
जो खिंचती रही कभी खाल।

कितने किस्से सुनाऊँ
उस छतरी के
अब
बाबूजी बहुत दूर हैं,
पहली बारिश ने
देकर दस्तक
दिलाई याद भरपूर है।

बात-बेबात लगा
फट्टा वह छतरी का
आज भी याद आ जाता है,
तब लगता है पीठ सहलाई बाबूजी ने
और
आशीर्वाद मिल जाता है।

-प्रदीप कुमार अरोरा
पुणे

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