चल चुके हैं
दाँव अपने अँधेरे सब
उजालों आ गई अब
बारी तुम्हारी
धैर्य रखना समय लेना
खेल की
बारीकियों पर ग़ौर करना
है प्रतिद्वंद्वी बहुत उस्ताद
उसकी
चाल को पूरा समझना
समेकित कर बिंदु सारे
ध्यान रख कर
खेलनी है
होशियारी भरी पारी
खोजते हो तुम अभी तक
ध्येय ‘जय’ में
विपक्षी का ध्येय ‘जय’ है
तर्क के बंदी हुए तुम
तर्क को
बंदी बना वो निसंशय है
कल्पना में,बाद का हर
दृश्य सोचो
क्या रहेगा,
अगर बाज़ी गयी हारी
मैं प्रवक्ता ही रहा हूँ
आज भी हूँ
और आगे भी रहूँगा
जय-पराजय, भय-अभय की
कथाओं में
अंततः ‘निष्कर्षतः’ मैं ही कहूँगा
हाँ मगर आगाह कर यह
चाहता हूँ
कथाओं के
अंत के स्वर हों न भारी।
-सीमा अग्रवाल
