फिक्र तो करनी पड़ेगी, पर बेफिक्र होकर,
ये शर्त है अब जीवन जीने की।
घबराकर नहीं, घुलकर नहीं,
सजग होकर, सुलझकर।
अपनों की फिक्र करेंगे बेफिक्र होकर,
रिश्तों में बोझ नहीं, बंधन बांधेंगे।
समाज की फिक्र करेंगे बेफिक्र होकर,
ताना नहीं, तानाबाना बुनेंगे।
मौसम की फिक्र करेंगे बेफिक्र होकर,
बादल देखकर डरेंगे नहीं, बीज बोएंगे।
पर्यावरण की फिक्र करेंगे बेफिक्र होकर,
एक पेड़ लगाएंगे, भाषण नहीं देंगे।
जलवायु परिवर्तन की फिक्र करेंगे,
पर बच्चों को डराएंगे नहीं, समझाएंगे।
जानवरों की फिक्र करेंगे बेफिक्र होकर,
रोटी का पहला टुकड़ा गाय को देंगे।
खेत-किसान की फिक्र करेंगे,
अन्न का एक दाना भी व्यर्थ नहीं करेंगे।
शहर-गाँव की फिक्र करेंगे,
गाँव को शहर नहीं, शहर को गाँव बनाएंगे।
सरोवरीय देश की फिक्र करेंगे,
तिरंगे को सीने में रखकर, सीमा पर नहीं सिर्फ,
अपने कर्म में भी देश बचाएंगे।
फिक्र करेंगे पर चिंता नहीं करेंगे,
क्योंकि चिंता चिता समान होती है।
फिक्र करेंगे कर्म बनकर,
बेफिक्र रहेंगे धर्म बनकर।
यही है अब जीने का नया मंत्र –
बेफिक्र होकर, फिक्र करेंगे
क्योंकि निश्चिंत वही हो सकता है,
जिसने अपनी फिक्र को फर्ज बना लिया।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
