बहुत नखरे थे हमारे खाने में,
अकेले हुए तो सब कुछ खाना आ गया।
जिसने गरम न करी थी सब्ज़ी भी कभी,
आज उसे खाना पकाना आ गया।
जिसके आगे-पीछे घूमते थे सभी,
खुद ही भागकर सब करना आ गया।
बेफिक्र थे जब माँ-बाप साथ थे,
दूर होते ही धूप को सहना आ गया।
बड़ा बेबाक होकर कह देते थे,
उनके टोकने पर उनको,
खुद पर पड़ी तो चुप रहना आ गया।
खो गई वो बेफिक्री कहीं,
ज़िम्मेदारियों का ऐसा घेरा आ गया।
कल तक जो हर बात पर मुस्कुरा देते थे,
आज हर फैसले ने सोचने का पहरा आ गया।
समझ आया तब माँ-बाप का हर कहना,
वो डाँट भी उनके प्यार का हिस्सा थी।
बेफिक्र बचपन कब पीछे छूट गया,
ये बात समझने में ही आधी उम्र बीत गई
बेफिक्री उम्र से नहीं,
अपनों के साथ से मिलती है;
जब सिर पर माँ-बाप का साया हो,
तभी ज़िंदगी सबसे हल्की लगती है।”
-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)
