बात -बेबात

रोज गुस्सा बात -बेबात ही।
ख्वाब खुशियों की न बारात ही।

उम्र सारी ज़ख्म सीती रही,
वो खुशी आई न सौगात ही।

जुल्म करता वो गया बेअवसर।
हैरत ये जिंदा है हालात ही।।

दौर ए हिंसा दास्तानें यही,
ज़िंदगी निस्सार खैरात ही।

हार जाती है अकेली तन्हा।
न्याय अंधा है न औकात ही।

-अमितारवि दुबे
छत्तीसगढ़

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