हर समय मुँह उठा कर घर आया न कर
बात-बेबात यूँ ही हमसे टकराया न कर
हर घर में पूछे बिना जाने की आदत तेरी
हम दिल के बड़े बैठ जा इतराया न कर
चेहरों पे लकीरें हँसी की रास आती नहीं
तो अकेला देख के खिलखिलाया न कर
शोर भीतर भी है शोर बाहर भी है सुनेगा?
खिली धूप में बादल बन के छाया न कर
बहती नदी को रोकने की कोशिश भी क्यूँ
बात-बेबात आगे बढ़ तू आजमाया न कर
रुकना तुम्हारी फ़ितरत नहीं जानती हूँ मैं
कभी संग अपने सुख को यहाँ लाया कर।
-डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
