बात-बेबात

हर समय मुँह उठा कर घर आया न कर
बात-बेबात यूँ ही हमसे टकराया न कर

हर घर में पूछे बिना जाने की आदत तेरी
हम दिल के बड़े बैठ जा इतराया न कर

चेहरों पे लकीरें हँसी की रास आती नहीं
तो अकेला देख के खिलखिलाया न कर

शोर भीतर भी है शोर बाहर भी है सुनेगा?
खिली धूप में बादल बन के छाया न कर

बहती नदी को रोकने की कोशिश भी क्यूँ
बात-बेबात आगे बढ़ तू आजमाया न कर

रुकना तुम्हारी फ़ितरत नहीं जानती हूँ मैं
कभी संग अपने सुख को यहाँ लाया कर।

-डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x